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वर्ल्ड बाइसिकल डे पे एक कविता

  वर्ल्ड बाइसिकल डे पे एक कविता ये चक्को वाली धारे अपने ऊपर एक सीट आसान जमाये हम बैठे बांधे खोपड़ी में एक कवच बड़ी दूर की सड़क ले खड़क -भड़क कभी उठक -पटक कभी झामर -झामर कभी इट कभी पत्थर कभी सूखा -कभी कीचड़ कहीं पानी .....कहीं कमल मेरी साइकिल भागे सरपट -सरपट पीछे बांधे कुछ बर्तन -सरतन आवाज होती है धनम - धनम ये घास की नरम क्यारी पहियाँ कहे हाय रे मैं वारी -वारी   इतना नरम बिछोना चल मेरे बबुआ मैं भागूं.... ले आऊं तेरी दुल्हनिया आज ही करा दूँ तेरा गौना || हाय ......हो गया अब कांड आया एक कील शैतान पहियाँ ........कहे हाय मार डाला सारा बियाह का सपना एक कील ने तोड़ डाला अब चले पंचर की दूकान करे ठुकर -ठाय पान चाबए .... चपर चपर ये दूकान वाला भी लगता है गड़बड़ -गड़बड़ चिंता यही सताती मेरी साइकिल भी तो रोती जाती ओह्ह्ह्ह ,, देखो ले आया बना के पहियाँ ........ अब होगा गौना और आएगी कनईया  || मेरी कलम से :))