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 साला हम कबसे तरय कर रहे है ,, वो लाल सूट वाली से बात करने को।  अभी तक मौका ही नहीं मिला। मौका ,, मौका ढूंढोगे बेटा तो हो गया ,, हो गयी वो किसी और की। हम खुद ही में बतियाते -बतियाते सो जाते है रोज ,, साला दिल की मानता नहीं। आज सोच रहे है की बात कर ही ले ,, मान जाएंगी देवी जी तो ठीक ना तो बहन बुला लेंगे ,, किसी और की। पकडे ऑटो रिक्सा भागे कॉलेज ,, हाँ अभिये टाइम था उसके आने का .......। बेग तेज था दिमाग का ,, ऑटो धीरे चल रहा था ,, कम्बखत बहुत धीरे। आ गया कॉलेज ,, क्लास ओवर हो गया था ,, मन ही मन बोले क्या टाइमिंग है भाई, आगे बढे सब लडकियां निकल रही थी .......। देवी जी दिखी नहीं ..। हम पूछ बैठे रीमा जी आई है क्या ? उनकी दोस्त ने हमें ऐसे देखा जैसे इनके हाथ में होतो कभी हम इनके जीजा जी ना बन पाएंगे।  घूरती रह गयी बहन जबतक हम इनकी आँखों से ओझल न हुए।

रात की काली कढ़ाई

 रात की काली कढ़ाई में सफ़ेद सा चुना लगा के एक नजर बट्टू बनाया है अब ,, उसे लगाना है चाँद के खेत में जहां मैंने सितारों की खेती की ,, हाँ सितारों की खेती ये सितारे चमकते नहीं है ये तो बस मेरे आँखों से निकले वो मोती है जिन्हे मैंने अपने आँचल में पोंछ के ,, झाड़ दिया था || प्रिया मिश्रा :))

पीड़ा

  पीड़ा आने से पहले कभी संदेसा नहीं देती लेकिन जाते वक़्त कुछ अनुभव दे जाती है थोड़ा हमें खड़ा रहना सीखा जाती है रोते -रोते आँखों के झरने से छोटी पगडंडियां अपने आप बन जाती है और फिर,,, हम उन पगडंडियों पे चलते चलते सिख जाते है पीड़ाओं से मित्रता करना || प्रिया मिश्रा :)

वर्ल्ड बाइसिकल डे पे एक कविता

  वर्ल्ड बाइसिकल डे पे एक कविता ये चक्को वाली धारे अपने ऊपर एक सीट आसान जमाये हम बैठे बांधे खोपड़ी में एक कवच बड़ी दूर की सड़क ले खड़क -भड़क कभी उठक -पटक कभी झामर -झामर कभी इट कभी पत्थर कभी सूखा -कभी कीचड़ कहीं पानी .....कहीं कमल मेरी साइकिल भागे सरपट -सरपट पीछे बांधे कुछ बर्तन -सरतन आवाज होती है धनम - धनम ये घास की नरम क्यारी पहियाँ कहे हाय रे मैं वारी -वारी   इतना नरम बिछोना चल मेरे बबुआ मैं भागूं.... ले आऊं तेरी दुल्हनिया आज ही करा दूँ तेरा गौना || हाय ......हो गया अब कांड आया एक कील शैतान पहियाँ ........कहे हाय मार डाला सारा बियाह का सपना एक कील ने तोड़ डाला अब चले पंचर की दूकान करे ठुकर -ठाय पान चाबए .... चपर चपर ये दूकान वाला भी लगता है गड़बड़ -गड़बड़ चिंता यही सताती मेरी साइकिल भी तो रोती जाती ओह्ह्ह्ह ,, देखो ले आया बना के पहियाँ ........ अब होगा गौना और आएगी कनईया  || मेरी कलम से :))
 हम हर रोज सोचते है की कुछ बदले .............कुछ नया हो .............लेकिन खुद कुछ नया करे ...........या कोइ कुछ नया करे तो हम उसे सराहे ये हम कभी नहीं सोचते | हमारा काम है हर नया काम करने वाले को तबतक उलाहना देना जबतक वो पूरी तरह से  निराशा में ना घिर जाए | यदि ,, वो निकल आता है हमारी इन सब गटर वाली बातों से निकल कर तब हम कहते है ..........आदमी था काम का || और वो ,, ना निकल पाए तो .................उसके मरने का हमें कोइ दुःख नहीं रहता ..........हम फिर से नया शिकार ढूंढ लेते है || हम सभी  सामाजिक प्राणी कम  और वायरस जायदा है ................हम मनुष्य है ...............लेकिन मनुष्यता नहीं जानते || हमें रोज कुछ नया चाहिए ..................किसी की मदद हो गयी ,, सैलरी में बढ़ोतरी ,, किसी को खाना खिलाना ...........किसी के चहरे पे मुस्कराहट लाना ............ कोइ नई चित्रकारी बनाना...............कुछ नया करना .................कुछ नया पकाना ............कुछ नया खाना ................आसमान में लकीरे खींचना ....................जमीं में तारे उगना.............  फसलों की तो बात ह...
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हिंदी कविता 3       अपने बुरे समय में .................सबसे बेहतर हैं,, सबसे दूरियां बढ़ा लेना क्योकि...................अक़्सर लोग आपकी नजदीकियों को ............. जरूरतों का नाम दे दिया करते है || प्रिया मिश्रा :))    **** भविष्य अभी खतरे में है और .................खतरे में रहेगा क्युकी लोग ना आज की सोचते है ना वो भविष्य की सोचते है भूतकाल में हम सभी का जीवन व्यतीत हो रहा है ||     प्रिया मिश्रा :))    
आपके किसी भी समस्या का बस एक ही समाधान है तब तक मौन रहिये ..................जब तक आप ,, उस समस्या का खुद समाधान ना ढूंढ ले मित्र ,, लोग विचार देते है ................ समाधान नहीं .....................वो हमें ही ,, ढूंढ़ना होता है ||    प्रिया मिश्रा :))   **** हर बात में हाँ ,, कह देने वाले लोगो से कभी उनकी मर्जी भी पूछ लिया कीजिये प्रिया मिश्रा :))   ****    मैं हर रोज ,, हर पल ठगा गया हूँ मैं हर रोज ,, हर पल ठगा जाऊँगा मैं मानवता हूँ ,, मैं एक दिन मनुष्यो के हाथो मारा जाऊंगा || प्रिया मिश्रा :))