साला हम कबसे तरय कर रहे है ,, वो लाल सूट वाली से बात करने को। अभी तक मौका ही नहीं मिला।
मौका ,, मौका ढूंढोगे बेटा तो हो गया ,, हो गयी वो किसी और की।
हम खुद ही में बतियाते -बतियाते सो जाते है रोज ,, साला दिल की मानता नहीं।
आज सोच रहे है की बात कर ही ले ,, मान जाएंगी देवी जी तो ठीक ना तो बहन बुला लेंगे ,, किसी और की।
पकडे ऑटो रिक्सा भागे कॉलेज ,, हाँ अभिये टाइम था उसके आने का .......। बेग तेज था दिमाग का ,, ऑटो धीरे चल रहा था ,, कम्बखत बहुत धीरे।
आ गया कॉलेज ,, क्लास ओवर हो गया था ,, मन ही मन बोले क्या टाइमिंग है भाई, आगे बढे सब लडकियां निकल रही थी .......। देवी जी दिखी नहीं ..। हम पूछ बैठे रीमा जी आई है क्या ?
उनकी दोस्त ने हमें ऐसे देखा जैसे इनके हाथ में होतो कभी हम इनके जीजा जी ना बन पाएंगे। घूरती रह गयी बहन जबतक हम इनकी आँखों से ओझल न हुए।
पीड़ा
पीड़ा आने से पहले कभी संदेसा नहीं देती लेकिन जाते वक़्त कुछ अनुभव दे जाती है थोड़ा हमें खड़ा रहना सीखा जाती है रोते -रोते आँखों के झरने से छोटी पगडंडियां अपने आप बन जाती है और फिर,,, हम उन पगडंडियों पे चलते चलते सिख जाते है पीड़ाओं से मित्रता करना || प्रिया मिश्रा :)
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